ताजमहल के प्रांगड़ मैं 'राधे राधे' की गूँज ने सभी आगंतुकों का ध्यान आकर्शित किया, और मानो कुछ पल ऐसा लगा की प्रांगड़ वृन्दावन बन गया हो। मौका था वृन्दावन और बनारस से आई विधवाओं के आगरा भ्रमण का। उनकी ये यात्रा 'सुलभ इंटरनेशन संस्था और पुरातत्व विभाग, आगरा' के प्रयासों के बाद सफल हुई।
Monday, 15 June 2015
दिखावटी जीवन क्यों ?
कुछ लोग सिर्फ दिखावे मैं क्यों विश्वास करते हैं, क्या सिर्फ दिखावा ही उनके जीवन का लक्ष्य है. मैं देखता हूँ अपने आस पास, हर रोज़ हर अख़बार मैं, भरे हुए शॉपिंग माल्स मैं लोग एक से मैं अपने आप को प्रदर्शित करने मैं लगे रहते हैं. मेरे मन मैं उठता है की क्या दिखावा ही उनका लक्ष्य है, या जमीनी जीवन का भी उनके लिए वक़्त है.
ऐसे लोग
Monday, 12 January 2015
बदनसीब…… आगरा
आगरा, जो कभी मुगलों की राजधानी हुआ करता था, और संपूर्ण विश्व मैं एक महत्वपूर्ण व्यापारिक स्थल था। वह आजकल सिर्फ एक राजनीति का हिस्सा बन कर रह गया है. ना जाने कितने ही शाशक आये और गए पर मुगलों के बाद से कोई भी उसको उसका असली वजूद नहीं दिल पाया। अंग्रेज़ों के समय से ये शहर अपनी पहचान खोता गया. दिल्ली, कलकत्ता, बॉम्बे आदि महानगरों के आगे ये शहर बोना होता चला गया. जिस शहर मैं मुगलों के राज्य के दौरान हर कोई आने को उत्सुक रहता था, आजकल किसी का गुजरने का मन नहीं करता। लोग आते तो हैं, पर जाते वक़्त ना आने की कसम खा कर जाते हैं। …ऐसा है ये बदनसीब शहर
आजकल हर कोई.…ताज महल, आगरा क़िला और अन्य स्मारक देखने के लिए ही आते है, पर कोई भी शहर देखने मैं दिलचस्पी नहीं दिखाता। और एक बात सत्य भी है की कोई क्यों देखे शहर, इसमें रखा ही क्या है. इन स्मारकों के अलावा इस शहर मैं रखा ही क्या है.…जिधर देखो उधर या तो गन्दगी का ढेर मिलेगा नहीं तो जेब काटने वाले कुछ स्वार्थी लोग.
सुविधाओं के अभाव मैं विकलांग होता जा रहा है ये.… बदनसीब आगरा।
कभी दिल्ली की राजनीति का शिकार हो जाता है तो कभी किसी और शहर की,… पर इसके नाम पर हर कोई अपने सिक्के चमका रहा है. पर्यटन से जुड़े हुए कुछ स्वार्थी लोग इस शहर से सिर्फ पैसा बटोरने मैं लगे हुए हैं, पर कोई भी इसका क़र्ज़ चुकाने मैं दिलचस्पी नहीं दिखता। प्रत्येक दिन इसके साथ बेईमानी होती, पर फिर भी ये चुपचाप रहता है. ना जाने कितने लोग आये इस शहर की छवि सुधारने के लिए, पर हर कोई अपनी ही छवि सुधारकर के पीठ दिखा कर चला गया।
हाँ पर राजनीति करने वाले लोगों के लिए अभी भी ये शहर अवसरों की कुंजी है. माननीय विधायक जी से लेकर सांसद जी तक हर कोई इस शहर का क़र्ज़ चुकाने के झूठे वादे करता रहा, पर वास्तविकता कुछ और ही निकली। अपने पांच वर्ष पूरे करने के बाद दोबारा झूठे वादों के साथ, अपने आप को शहर का सच्चा हितेषी कहता रहा. क्या ये ही लिखा है इस शहर के भाग्य मैं. इससे अच्छा तो ये गुलामी के दिनों ही अच्छा था, क्यूंकि कम से कम अंग्रेज़ों ने इस शहर को विश्व भर मैं दोबारा पहचान दिलायी। ताज महल के उद्धार से लेकर स्ट्रेची ब्रिज तक आगरा को देकर गये. पर आजकल के राजनेता तोह ये सब अपने बंगलों मैं बनाना चाहते हैं। हर कोई सिर्फ और सिर्फ राजनीति के उद्देश्य से ही इस शहर मैं प्रवेश करता है…पर ये भोला शहर सिर्फ उसकी ही छवि बनाने मैं लगा रहता है.
एक सवाल मेरे जेहन मैं आता है, की क्या यही है लिखा है इस बदनसीब शहर के भाग्य मैं.… क्या कभी इसके भी अच्छे दिन आएंगे। क्या कभी कोई कहेगा गर्व से की हम आगरा घूमने जा रहे हैं. पर मेरी कलम इस शहर का गुड़गां हमेशा करती रहेगी। ।क्यूंकि मुझे इस शहर से बेइंतहा प्यार है, और रहेगा।
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